Monday, April 22, 2019

कुछ गीत बनाए हैं मैंने

कल्पना के पंख लगाकर,
कुछ ख्बाव सजाए मैंने।
अनुभूति को आधार बनाकर,
कुछ गीत बनाए हैं मैंने।

जीवन के कोरे पन्नों पर,
कुछ भाव उकेरे हैं मैंने।
बुद्धि को कलम बनाकर
कविताएँ रच दी हैं मैंने ।

भावों के मोती चुन-चुनकर,
दिल को दवात बनाया मैंने।
शब्दों की माला में गूंथकर,
इक संसार सजाया मैंने।

भाव आत्मा, रस है प्राण,
शब्द शरीर, अर्थ है पहचान।
भावों के अनुपम मोती से,
उत्तम काव्य का हो निर्माण।
अभिलाषा चौहान
स्वरचित

Tuesday, March 26, 2019

प्रभात बेला






प्राची दिशा में छिटकी लालिमा
बिखरने लगा मंगल कुमकुम
हर्षित वसुधा पा सौभाग्य प्रतीक
जाग्रत जीवन हर्षित तन-मन
वृक्ष भी करने लगे हैं नर्तन
पक्षी कलरव गूंज उठा है
जीवन फिर से झूम उठा है
खिलने को कलियाँ उत्सुक
सिंदूरी आभा में जलधि
सुंदरता का करता संवर्धन
सिंदूरी हुआ हिमगिरि
अति अलौकिक दिव्य दर्शन
तन-मन सिंदूरी हुआ हमारा
जब वसुधा पर बिखरा
मंगल कुमकुम सारा
जगजीवन हुआ ऊर्जावान
गऊएं भी छेड़ रही तान
खेतों में लहराती हरियाली
ग्वाले ने बांसुरी निकाली
सुनाई उसने मधुर धुन
भंवरा भी करता गुन-गुन
मंगलमय हुआ सारा जीवन
जब दिनकर का हुआ आगमन। ।

अभिलाषा चौहान 

एक दीप ऐसा जलाए

दीपावली पर
जलें दीप ऐसे
मिटे तम कलुष
मिटे अज्ञान ऐसे
रवि-किरणें
करें तम का नाश जैसे।
दीप मालाएं
हर ओर जगमगाएं
सबके जीवन में
ऐसे ही खुशियाँ आए
जैसे बगिया में
अनेक पुष्प खिल जाएं।
जीवन में यश सुख
समृद्धि बढ़े ऐसे
कोई पौधा वृक्ष
बनता हो जैसे।
दीप दीवाली के
कर दें हर घर को रोशन
नहीं हो कहीं भी
किसी का अब शोषण।
एक दीप जलाएं
 सदा हम ऐसा
हो अंतरतम प्रकाशित
मन से मन का
कराए मिलन हमेशा
अभिलाषा चौहान
स्वरचित



दीवाली

आया दीवाली का पावन त्योहार,
संग लाया अपने खुशियाँ अपार।
द्वार - द्वार सजने लगे तोरण,
जगमग दीपों से हर घर रोशन।
इतने दीप जले धरती पर ,
कालिमा अमा की लेते हैं हर।
पाँच दिनों का ये पर्व मनोहर,
बड़े उल्लास से मनता घर-घर।
मन से मन फिर मिलने लगे हैं ,
प्रेम-पुष्प फिर खिलने लगे हैं।
आओ मिलकर त्योहार मनाएं,
दीप-दान कर अंधकार मिटाए।
बस इतनी सी इच्छा है मन में,
अंधकार न रहे किसी के जीवन में ।

अभिलाषा चौहान
स्वरचित

गोवर्धन पूजा

करिए नित गोधन की पूजा,
उस सम कोई और न दूजा।
गो साक्षात लक्ष्मी स्वरूपा,
गो संवर्धन संस्कृति अनुरूपा।
पंचगव्य अति पावन अमृत,
गोबर, मूत्र, दूध, दही और घृत।
कान्हा को गऊएं अति प्यारी,
गो रक्षण करें गो हितकारी।
गोवर्धन का अर्थ यह दूजा,
गोमाता की करिए सदा पूजा।
गोमाता सहें कष्ट अपारा,
गोरक्षण हो संकल्प हमारा।
गोसंवर्धन करो जीवन के हेतु,
कान्हा भक्ति में है गोमाता सेतु।
गोवर्धन भी गोबर से ही बनते,
नवान्नों के फिर भोग हैं लगते।
बिन गो के गोवर्धन न होंगे,
बिन गो सेवा कान्हा प्रसन्न न होंगे।

अभिलाषा चौहान
स्वरचित 

Monday, January 28, 2019

मानव के संस्कार

पर सेवा परोपकार,
मानव के हैं संस्कार।
कर मानवधर्म अंगीकार,
करते सदा जगत-उपकार।
निस्वार्थ भाव से होते पूर्ण,
संस्कार होते संपूर्ण।
दीन-हीन दुखियों के उद्धारक,
अत्याचार के होते संहारक।
आबाल-वृद्ध की करते सेवा,
कभी नहीं थकते है देखा।
सेवा ही जीवन का लक्ष्य,
कर्म से सदा होती प्रत्यक्ष।
एक उदाहरण ऐसा जग में,
चांद सा चमके इस नभ में।
मदर टेरेसा नाम है उनका,
सेवा ही था धर्म जिनका।
कितनों का जीवन संवारा,
कितनों को दिया सहारा।
दीन-हीन की थी वे आशा,
देख उन्हें मिटती थी हताशा।
नाम अमर उनका है जग में,
चमकी बनके तारा नभ में।

अभिलाषा चौहान
स्वरचित





Sunday, December 2, 2018

प्यार एक खूबसूरत एहसास

प्यार एक खुबसूरत एहसास,
प्यार जीवन की आस और विश्वास !!
प्यार प्रभु की अनमोल नियामत,
प्यार शीतल हवा का झौंका,
पुष्पों की भीनी-भीनी सुगंध है।।
प्यार दीपक की लौ, मंदिर की घंटी,
पायल की खनक,नुपुरों की झनकार है!!
प्यार में बसे सतरंगी सपने,
कुछ मेरे कुछ तेरे सबके अपने।
प्यार में रचा-बसा सारा संसार,
प्यार जीवन में भावों का हार।
प्यार में समर्पण,त्याग,दीवानापन,
आनंद,मधुरता,सहज अपनापन।।
क्रोध ,राग,द्वेष ,ईर्ष्या से परे,
सुन्दर,सरल,सहज जीवन।।
प्यार दिलों को जोड़ता है,
परमार जीना सिखाता है।।
प्यार राह दिखाता है,
इसमें समाहित हो जाते 
'मैं 'और 'तुम'रह जाता 'हम'
यही वसुधैव कुटुंबकम् का आधार है।।

अभिलाषा चौहान
स्वरचित